जैसा की हम सभी जानते हैं कि समाज में हर तरह के बच्चे होते हैं, उन्हीं में कुछ ऐसे होते हैं जो सज़ा के डर से अपने अंदर परिवर्तन लाते हैं और वहीं कुछ इनाम के लालच में ऐसा करते हैं | इनाम व्यव्हार पर फुर्ती से बदलाव का दावा करता है । हालांकि इनाम द्वारा परिवर्तन का प्रभाव कम स्थायी होता है और अच्छे व्यवहार को लगातार बनाए रखने के लिए इनाम का निरंतरता अहम् होता है। दूसरी ओर सज़ा के द्वारा कोई भी अपने दृष्टिकोण के आधार पर किसी और के व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं, परन्तु सज़ा के द्वारा बच्चों को अपनी बात को मनवाना आसान होता है। किन्तु डरा कर सज़ा से हम उन्हें कहीं ना कहीं यह भी सिखाते हैं कि वह दूसरों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करें। सज़ा से या डर से हम बच्चों की भावनाओं को दबाने पर मजबूर कर देते हैं । हालांकि अधिक प्रभावी तरीका यह है कि आप इनाम और सज़ा प्रणाली दोनों का उपयोग करें । परन्तु एक के बाद एक का उपयोग करने से बच्चे के भीतर बड़ी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं । यदि आपका मुख्य लक्ष्य उन्हे नैतिक मूल्य सिखाना है, यदि आप दूसरों पर भरोसा करना चुनते है तो वास्तव में यह पूरी तरह से अयोग्य तरीका है । विशेष रूप से बुरे व्यवहार को दंडित करना और अच्छे व्यवहार को पुरस्कृत करना एक अच्छा विचार है, लेकिन यह गहरी जटिलता का एहसास करना महत्वपूर्ण है । यहां यदि आप लगातार एक बच्चे को दंडित कर रहे हैं तो आखिरकार यह उस बच्चे को ढीठ बना देगा और इसलिए आगे सज़ा भी उपयोगी नहीं होगी । इसके अलावा पुरस्कारों के साथ , बच्चे को बिगाड़ने का जोखिम होता है, जहां उसे लगता है कि उसे हर वस्तु के लिये पुरस्कार मिलना चाहिए । बी. एफ. स्कीनर ने भी अपने एक सिद्धांत में सज़ा तथा इनाम के बारे में बात करी है । उनके अनुसार इनाम तथा व्यवहार में एक तालमेल है जो सीखने पर बल डालता है । परन्तु इनाम तथा सज़ा का उपयोग परिस्थिति अनुसार करना चाहिये क्योकिं नियमित और परस्पर हर छोटी बात पर इनाम तथा सजा का प्रयोग बालक को आदी तथा ढीठ बना सकता है । जिससे उनके अंदर या तो डर या कठोरपन या लालच बैठ जाता है और उनका नैतिक विकास नहीं होता है।
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